नमस्ते दोस्तों! क्या आप RSSB Lab Assistant Exam (प्रयोगशाला सहायक परीक्षा) की तैयारी कर रहे हैं? अगर हाँ, तो आज का यह आर्टिकल आपके लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित होने वाला है। जीव विज्ञान (Biology) के सिलेबस में 'शैवाल (Algae)' एक अत्यंत महत्वपूर्ण टॉपिक है, जिससे परीक्षा में अक्सर प्रश्न पूछे जाते हैं।
इस पोस्ट में हम RSSB Lab Assistant Syllabus के अनुसार शैवाल के सामान्य लक्षण, उनके आवास, प्रजनन और विशेष रूप से उनके थैलस संगठन (Thallus Organization) के बारे में विस्तार से चर्चा करेंगे। ये हस्तलिखित शैली के नोट्स सरल हिंदी भाषा में तैयार किए गए हैं ताकि आप अपनी तैयारी को और भी मजबूत बना सकें और परीक्षा में बेहतर स्कोर कर सकें। चलिए, विस्तार से जानते हैं शैवालों के बारे में।
शैवाल सरल सजीव होते है। शैवाल स्वंयपोषी होते है, क्योंकि ये पौधों के समान सूर्य के प्रकाश की उपस्थिती में प्रकाश संश्लेषण की क्रिया द्वारा अपना भोजन स्वयं बनाते है। ये एक कोशिकीय से लेकर बहु-कोशिकीय अनेक रूपों में हो सकते है। ये नम भूमि, अलवणीय एवं लवणीय जल, वृक्षों की छाल पर, नम दीवारों पर हरी, भूरी या कुछ काली परतों के रूप में मिलते है।
शैवालों के विभेदात्मक लक्षण:
- अधिकांशतः शैवाल जल में पाये जाते है। प्रायः ये अलवणीय जल में तथा कुछ समुद्री जल में मिलते है।
- पीढ़ी एकान्तरण स्पष्ट नहीं होता तथा जीवन चक्र सामान्यतः हेप्लोंबायोन्टिक प्रकार का होता है।
- थैलस प्रायः एककोशिकी अथवा बहुकोशिकी होता है।
- थैलस में प्रायः कार्यिकी श्रम विभाजन नहीं पाया जाता है।
- इनमे संवहन उत्तकों का पूर्ण रूप से अभाव होता है।
- अधिकतर शैवालों में युग्मकोंद्भिद (n) अवस्था जीवन की प्रभावी अवस्था जबकि बीजाणुद्भिद (2n) अवस्था गौण अवस्था होती है।
- कोशिका भित्ति सेल्युलोज की बनी होती है किन्तु कुछ शैवालों (नील हरित शैवाल) में यह म्यूकोपेप्टाइड की बनी होती है।
- कुछ शैवालों में हरितलवक के अलावा भी वर्णक उपस्थितः होते है जैसे नीले रंग के वर्णक फायकोंसायनिन्, भूरे पीले रंग के वर्णक फायकोंजेन्थिन तथा लाल रंग के वर्णक फाइकोइरिथ्रिन कहलाते है।
- संचित भोजन मुख्यतः स्टार्च के रूप में मिलता है तथा कुछ में वसा व तेल के रूप में भी पाया जाता है।
- जनन कायिक, अलैगिक अथवा लैगिक विधियों द्वारा होता है।
- जननांग प्रायः एककोशिकीय होते है परंतु कुछ में बहुकोशिकीय होते है। ये बंध्य आवरण द्वारा ढके हुए नहीं होते है।
- बहुकोशिक स्थिति में समस्त कोशिकाये जननक्षम होती है।
- अलैगिंक जनन चलबीजाणु, सुप्तबीजाणु, अचलबीजाणु, जनकाभ बीजाणु, निश्चेष्टबीजाणु तथा चतुष्कीय बीजाणु इत्यादि द्वारा होता है।
- लैगिक जनन समयुग्मकी, असंयुग्मकी तथा विषमयुग्मकी प्रकार का होता है।
- शैवालों में युग्मकी संलयन के पश्चात भ्रूण का निर्माण होता है। जीवन चक्र में बनने वाले युग्मनज से अर्धसूत्री विभाजन द्वारा सीधे ही पादप का निर्माण होता है।
- जीवन की अगुणित तथा द्विगुणित अवस्था एक-दूसरे पर आश्रित नहीं होती बल्कि पूर्ण रूप से स्वतंत्र होती है।
थैलस संगठन शैवालों का शरीर सुकायक (thalloid) होता है अर्थात् जड़, तना, तथा पत्तियों में विभेद नहीं पाया जाता। सुकाय संगठन के आधार पर शैवालों के विभिन्न प्रकार निम्न है-
1. एककोशिकीय शैवाल: ये शैवाल केवल एक कोशिका से ही बने होते है। जीवन की सभी क्रियाए एक कोशिका में सम्पन्न होने के कारण इन्हे अकोशिकीय जीव भी कहते है। ये निम्न प्रकार के होते है- (a) चल प्रकार (motile forms): चलन अंग कशाभिक पाये जाते है। क्रोमुलाइना में एक कशाभिक, क्लेमाइडोमोनास में दो कशाभिक, चलन कूटपाद द्वारा होने पर शैवाल अमीबिय प्रकार के कहे जाते है। उदाहरण- क्रिसअमीबा। इनमे कोशिका भित्ति का अभाव पाया जाता है। (b) अचल प्रकार (non-motile form): इनमे किसी भी प्रकार का चलन नहीं पाया जाता है। जैसे- क्लोरेला व स्पाइरुलाइना।
2. बहुकोशिकीय शैवाल: ये शैवाल एक से अधिक कोशिका के बने होते है। ये निम्न प्रकार के होते है-
(I) समुच्चय (aggregates)- जब अनेक कोशिकाये एक साथ रहकर स्वतंत्र रूप से व्यवहार करती हुई पाई जाती है तो उसे समुच्चय कहते है। इसके निम्न प्रकार है- (i) श्लेष्मस्थलाभ (palmelloid) समुच्चय: अनेक अकशाभिकी एककोशिकीय शैवाल श्लेष्म से घिरी रहती है। उदाहरण- पॅामेला व ट्रेस्टास्पोरा। (ii) वृक्षाभ समुच्चय (dendroid): कोशिकाओ के आधारी सिरे से श्लेष्म का स्त्रावण होने के कारण कोशिकाये शाखाओ के रूप में सुक्ष्मदर्शीय वृक्ष का निर्माण करती है। उदाहरण- प्रेसिनोक्लेडस। (iii) कूटपाद समुच्चय (rhizopodial): इसमे प्रत्येक कोशिका जीवद्रव्य प्रक्षेपों द्वारा जुड़ी रहती है। उदाहरण- राइजोक्राइसिस। (iv) साधारण कशाभिकी: इसस प्रकार के समुच्चय में कशाभिक कोशिकाये अनिश्चित संख्या में पाई जाती है। इनमे ध्रुवता का अभाव पाया जाता है। उदाहरण- साइन्यूरा।
(II) समंडल (coenobium)- समंडल समुच्चय से भिन्न होता है। इसमे विशिष्ट प्रकार से व्यवस्थित निश्चित कोशिकाये होती है। इनका आकार व आकृति भी निश्चित पाई जाती है। कोशिकाये परस्पर योजकों से जुड़ी पाई जाती है तथा ध्रुवता पाई जाती है। इनके दो प्रकार है- (i) चल समंडल- पेंडोराइना व युडोराइना में 4-32 तक विभिन्न प्रकार से व्यवस्थित कोशिकाये पाई जाती है। वॉलवॉक्स में 500 से 60 हजार तक कोशिकाये पाई जाती है जो जीवद्रव्यी सूत्रों से जुड़ी होती है। अधिकांश समंडलों में सभी कोशिकाए एक समान होती है परंतु वॉलवॉक्स में कुछ कोशिकाये सामान्य कोशिकाओ से बड़ी होती है, उन्हे गोनिडिया कहते है। इनका कार्य प्रजनन का होता है। (ii) अचल समंडल- इस् समंडल के निर्माण में अचल कोशिकाओ का योगदान होता है। पेडिएस्ट्रम प्लेट जैसी तथा हाइड्रोडिक्टिओन जाल जैसा होता है। सेनेडेस्मस भी एक अचल समंडल है।
(III) तंतुकी शैवाल (Filamentous Algae)- जब शैवालों में कायिक कोशिका विभाजन निरंतर एक दिशा में होता है तो कोशिकाये एक सिरे की ओर रेखीय क्रम में व्यवस्थित पाई जाती है, जिससे तंतुकी सरंचना बनती है। तंतुक दो प्रकार के हो सकते है- (i) अशाखित- ये तन्तु प्रायः सरल एवं सीधे होते है। ये स्वतंत्र रूप से तैरते हुए जैसे स्पाइरोगाइरा अथवा आधार से चिपके हुए जैसे यूलोथ्रिक्स व उड़ोगोनियम हो सकते है। नोस्टोक में अनेक तन्तु श्लेष्म में घिरकर अनियमित आकृति की तंतुकीय कालोनी का निर्माण करते है। (ii) शाखित- शाखन दो प्रकार का पाया जाता है- असत्य व सत्य शाखन। असत्य शाखन में शाखाओ के मध्य जीवद्रव्यी संबंध नहीं पाया जाता। सायनोफायसी के सायटोनीमा में मिथ्या शाखन पाया जाता है। सत्य शाखन की तन्तु कोशिका में पार्श्व उवर्धन व पटनिर्माण की क्रिया से शाखा का निर्माण होता है। इस क्रिया को सत्य शाखन कहते है। सत्य शाखन में दो प्रकार के तन्तु बनते है- सरल शाखित एवं विषमतंतुक। शाखाये पार्श्वीय अथवा द्विभाजी प्रकार की पाई जाती है। पार्श्वीय शाखाये अधिक सामान्य होती है। पार्श्वीय उद्वर्ध शीर्षस्थ कोशिका के अतिरिक्त किसी भी कोशिका में बन सकता है। क्लेडोफोरा में मिथ्या द्विभाजन पाया जाता है। पार्श्व शाखा के उद्वर्धन से मुख्य तन्तु दूर धकेल दिया जाता है। सरल शाखित तन्तु के अन्य उदाहरण- वेस्टिएला, बल्बोकीट। विषमतंतुकी शाखन में दो भाग पाए जाते है। श्यान तन्तु आधार के समानांतर फेले हुए होते है तथा उदग्र तन्तु आधार के समकोण पर फैले होते है। उदाहरण- स्टाइगोक्लोनियुम, कोलिओकीट।
(IV) आभासी मृदूतक शैवाल (Pseudo parenchymatous algae)- शाखित तंतुओ के परस्पर संगठित पाए जाने से आभासी मृदूतक स्वरूप संगठित होता है। ये तन्तु परस्पर सटे होकर भी एक-दूसरे से पृथक पाए जाते है अर्थात उनमे सयोजन नहीं पाया जाता। कोलिओकीट स्कूटेटा मे सरलतम आभासी मृदूतक पाया जाता है। इसमे श्यान प्रकार के तन्तु परस्पर सटे रह कर चक्रिका के रूप मे व्यवस्थित पाए जाते है। जटिल आभासी मृदूतक का निर्माण दो प्रकार से होता है- (i) एक अक्षीय- इस स्वरूप मे एक मुख्य तन्तु से उत्पन्न शाखाये परस्पर शाखित रहकर सुकाय बनती है। उदाहरण- बेट्रेकोस्पर्मम, पॉलीसाइफोनिया (ii) बहुअक्षीय- इस स्वरूप मे एक से अधिक केन्द्रीय तंतुओ की सक्रियता से उत्पन्न शाखाये परस्पर शाखित रहकर सुकाय का निर्माण करती है। उदाहरण- लीबमानीया, निमोडर्मा, नीमेलिओन।
(V) नलिकाकार शैवाल (Tubular Algae)- ये शैवाल पटहीन, बहुकेन्द्रकी, नाली के समान पाए जाते है। केन्द्रक विभाजन के साथ पटनिर्माण की क्रिया सम्पन्न न होने तथा कोशिका दीर्घनन होने से इस स्वरूप का निर्माण होता है। ऐसी सरंचना को संकोशिकीय प्रकार का कहा जाता है। सरलतम साइफनी स्वरूप प्रोटोसाइफन व बोट्रिडियम मे पाए जाते है। वोउचेरिया शाखित नलिकीय सुकाय होता है। ब्रायोप्सिस व कॉलर्पा मे मुलाभास, अक्ष व पर्ण के समान शाखाए पाई जाती है।
(VI) मृदूतकी शैवाल (parenchymatous algae)- मृदूतक शैवालों की उत्पत्ति तंतुकी शैवालों से मानी गई है। तन्तु कोशिकाओ मे एक से अधिक तलो मे विभाजन होने से कोशिकाओ के पृथक न हो पाने के कारण मृदूतक सुकाय उत्पन्न होता है। उदाहरण- अल्वा, एंटीरोमॉर्फा। भूरे शैवालों मे अधिकतम विकसित मृदूतक स्वरूप पाए जाते है। जैसे- सारगैसम, फ्यूकस, मैक्रोसिस्टम। इनमे वृद्धि एक शीर्ष कोशिकीय सक्रियता से होती है। कुछ सदस्यों मे (सारगैसम, फ्यूकस) शीर्ष कोशिकीय सक्रियता के बाद की सक्रियता मेरिस्टोडर्म परत से होता है। इन शैवालों मे ऊतक विभेदन पाया जाता है। मज्जा की कुछ कोशिकाये चालनी नलिका के समान होती है जिन्हे तूर्य कोशिकाये कहते है।
(VII) इक्वीसीटम सम शैवाल- ये वस्तुतः तंतुकी शैवाल है जो मृदूतक संघटन बनाते है परंतु इनकी आकारिकी टेरिडोफायटा समूह के एक पादप इक्वीसीटम के समान होने के कारण अन्य शैवालों से पृथक किए जाने योग्य है। उदाहरण- कारा, नाइटेला। कारा मे मूल समान मुलाभास पाए जाते है। स्तम्भ के समान ऊर्ध्व स्थिति मे मुख्य अक्ष पाया जाता है जो पर्व एवं पर्व संधियों मे विभक्त रहता है। सीमित वृद्धि की शाखाओ पर् भी पर्व संधि व विभेदन पाया जाता है। इनकी पर्व संधियों पर एककोशिकीय अनुपर्णक व जटिल सरंचना युक्त प्रजनन अंग पाए जाते है। मुख्य अक्ष की कुवह पर्व संधियों पर असीमित वृद्धि की शाखाऐ पाई जाती है जो मुख्य अक्ष के समान होती है। आधार भाग पर वल्कुटी तंतुक पाए जाते है। ये शैवाल का अति जटिल संगठन वाला सुकाय होता है।
मित्रों, हमें उम्मीद है कि RSSB Lab Assistant के सिलेबस पर आधारित 'शैवाल (Algae)' के ये विस्तृत नोट्स आपके लिए अत्यंत उपयोगी साबित होंगे। शैवाल के सामान्य लक्षण और उनके थैलस संगठन को समझकर आप इस टॉपिक से जुड़े सवालों को परीक्षा में आसानी से हल कर पाएंगे।
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